Monday, April 9, 2012

प्रेम -कुछ भिन्न आयाम

मैं और तुम 
कुछ ऐसे दोस्त बने
की मैं मैं ही रहूँ
और तुम तुम ही रहो
मैं दिन को अगर रात कहूं
तो तुम मुझे सुधारो
हम चाँद के पार न जाकर
यहीं धरती पर सुलझाएं और लड़े
जमीनी वास्तविकताओं का
हम कल्पनाओं में नहीं जियें 
वरन  जिंदगी की आपाधापी में 
 एक दूसरे का संबल बने रहें
सच्चे दोस्त की तरह
हमारा प्रेम हमें बांधे  नहीं 
बल्कि मुक्त कर दे 
एक दूसरे को 
प्रेम में हम गिरे नहीं
बल्कि और ऊंचे उठ जाएँ 
अपनी अस्मिता से.

4 comments:

  1. प्रेम में हम गिरे नहीं
    बल्कि और ऊंचे उठ जाएँ
    अपनी अस्मिता से.
    ......कोमल भावनाएँ शब्दों से बाहर झांकती हुई !!!

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  2. धन्यवाद संजय जी

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  3. बहुत शानदार है ... अच्छा leekha ... धन्य हो गए हम...

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